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जिस डाल पर बैठे हम (कविता)

जिस डाल पर बैठे हम  (कविता)





जिस डाल पर बैठे हम
वही डाल काट रहे हम
पंचतंत्र की वही कहानी
रोजाना दोहरा रहे हम
भोजन हमारा वही
जो हमें ही खा रहा...
है रतन -
पानी की तो बात ना पूछो 
यह तरह-तरह के कोल्ड पेय पदार्थो में
तब्दील हो गया
शरीर की शिराओं में
चीनी बनकर घुल रहा
क्या मोटापा क्या बीमारी
नाम ना पूछ इतने सारे...
है रतन -
जिस डाल पे बैठे हम
वही डाल काट रहे हम
चमक दमक में खोये हम
वस्त्र हमारे खाये हमें
खादी-सूती-रेशम छोड़
फैशन के पीछे भाग रहे हम
पोलिस्टर के जाति उपजाति की
हर तरफ बस मेला है
पर कहे 'रतन' ये सब बीमारी का झोला है
क्या कैंसर-क्या चर्म रोग
क्या वायरस - क्या डिप्रेशन 
घर-घर तक पहुँच रहा 
सेल्स हमारे मरे परे हैं
पर दिखावा जरे-जरे में है....
जड़ -जमीन -मिट्टी छोड़
प्लास्टिक के बर्तन -खिलौना - बिछावन क्या 
हर तरफ देखो प्लास्टिक में ही घुसे पड़े हैं
सांसों में घुल गया यूँ
की मिट्टी की खुशबु
बस गंध हो गया...
हे रतन -
जिस डाल पर बैठे हम
वही डाल काट रहे हम....
जो पढ़ रहे हम
जो हमें पढ़ा रहे
क्या सही क्या गलत
समझने का सामर्थ्य खो रहे हम
जिस डाल पर बैठे हम
वही डाल काट रहे हम
हे रतन -
ऐसा ना हो की देर हो जाये
आने वाली पीढ़ी
हम पर अफसोस करे...
जिस डाल पर बैठे हम
वही डाल काट रहे हम
पंचतंत्र की वही कहानी
रोजाना दोहरा रहे हम



21-2-2022
~रश्मि




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