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बस इतनी सी मिल्कियत - कविता

बस इतनी सी मिल्कियत



अपनी ही जज़्बातों से
खुद ही फ़रेब खा रही ... 
अपनी ही उम्मीदों की
राख लपेटे जिस्म 
शमशान सा लग रहा... 
पलकों की भींगी कोर
आतिश सी सुलगती है... 
एक अंतहीन यात्रा
ज़िम्मेदारियाँ की मार
उम्मीदों का बोझ... 
और जिंदगी एक 
उलझा हुआ दश्त
ना आर ना पार... 
बस ऐसे में
चमकता चाँद व
दरीचा से छिटकी चांदनी... 
बारिश की बूंदें व
अज़ल से अबद तक 
यादें
बस इतनी सी मिल्कियत
हमारी...  

Rashmi ~







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