एक समय की बात है क्षीरसागर में श्याम वर्ण के बड़े-बड़े पत्थरों से बने मंदिर रूपी महल में जिसमें सर्वत्र जल ही जल प्रवाहित हो रहे थे।
चारों तरफ कमल पुष्प इस प्रकार बिखरे हुए थे मानो जल के हर कण में मैया लक्ष्मी विराजमान है।
वहीं पर शेषनाग की शैया पर भगवत् विष्णु जी योग निद्रा में विश्राम कर रहे थे।
इसी समय ब्रह्मा जी वहां पर पहुंच गए और विष्णु जी को प्रणाम कर उन्होंने बातचीत करना आरंभ कर दिया। बातचीत करते-करते उनमें वाद-विवाद होने लगा बाद में वाद-विवाद इतना बढ़ गया कि अत्यधिक भयंकर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।
इस भयंकर युद्ध की स्थिति देखकर सभी देवता गण भयभीत हो गए कि ना जाने कौन सा प्रलय आ पड़ा मन आशंकित हो उठा।
स्थिति काबू में ना देख कर सभी देवतागण भगवान भोलेनाथ के पास कैलाश पर्वत पर पहुंच गए ।
वहां जाकर उन्होंने कहा - हे महादेव... हे महादेव कृपा करें-कृपा करें।
विष्णु जी और ब्रह्मा जी के बीच चल रहे सारे वृत्तांत को महादेव को उन्होंने कह सुनाया। उन्होंने महादेव से उनके बीच-बीच बचाव करने की बात कही। वरना प्रलय आने का संकट उत्पन्न हो पड़ेगा।
महादेव तो महादेव हैं, मंद-मंद मुस्कान से वह उन्हें देर तक मुस्कुराते हुए देखते रहे।
निरंकार भगवान महादेव इस भयंकर युद्ध को देखकर एक विशाल अग्नि स्तंभ के रूप में इन दोनों के बीच में प्रकट हो गये। इस अद्भुत स्तंभ को देखकर ब्रह्मा - विष्णु और सभी देवतागण आश्चर्यचकित हो गए।
इस अग्नि स्तंभ का
ना आदि दिख रहा था
ना अंत दिख रहा था।
कहां से शुरू
कहां से खत्म
कुछ अता-पता नहीं था।
अब ब्रह्मा और विष्णु के बीच बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई कि क्या किया जाए कुछ तो पता किया जाए। दोनों भगवान ने आपस में विचार किया कि उनकी खोज की जाए।
कहां है इसकी ऊंचाई
और कहां है उसका अंत
महादेव तो महादेव हैं
ना आदि है ना अंत है
आपस में विचार विमर्श के पश्चात विष्णु जी वाराह का रूप धारण करके इसकी जड़ को खोजने नीचे की ओर चल पड़े। इसी प्रकार ब्रह्मा जी भी हंस का रूप धारण करके इस अग्नि स्तंभ का अंत खोजने के लिए ऊपर की ओर चल पड़े।
विष्णु भगवान पाताल लोक को खोद खोद कर बहुत दूर तक चले गए पर फिर भी उन्हें उसे अग्नि स्तंभ का जड़ नहीं मिला। आखिर में थक हार कर विष्णु जी वापस युद्ध-भूमि में आ गए। जहां सभी देवतागण उनकी व्याकुलता से इंतजार कर रहे थे।
उधर ब्रह्मा जी आकाश मार्ग से जाते हुए रास्ते में एक अद्भुत केतकी के फूल को गिरते हुए देखा। उस केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी से कहा - हे भगवन् इस स्तंभ के आदि का कहीं अता-पता नहीं है। आप इसे देखने की इच्छा का त्याग कर दीजिए।
ब्रह्मा जी सोच में पड़ गए।वह भगवान विष्णु से हारना नहीं चाहते थे। अब क्या किया जाए कौन से उपाय किया जाए। तो उन्होंने बहुत सोच समझ कर केतकी के फूल से कहा- हे केतकी पुष्प तुमसे नम्र निवेदन है - तुम मेरे साथ चल चलो
और विष्णु जी के समक्ष यह कह देना कि मैं इस स्तंभ का अंत देख लिया है, मैं इसकी साक्षी हूं।
विपत्तिकाल में मिथ्या का दोष नहीं लगता। केतकी पुष्प ने जाकर विष्णु भगवान के पास इन वचनों को कह दिया।
महादेव तो महादेव है वह तो अंतर्यामी है। ब्रह्मांड के हर कण में महादेव का वास हो, वहां कोई बात कहां छुपी रह सकती है।
महादेव विष्णु की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर देवताओं के समक्ष उन्हें अपनी समानता प्रदान की और ब्रह्मा के असत्य वचनों को सुनकर बोले - ब्रह्मा तुमने असत्य का पालन किया है इसलिए संसार में तुम्हारा कहीं सत्कार नहीं होगा और तुम्हारे मंदिर नहीं बनेंगे और पूजन उत्सव भी तुम्हारे नहीं होंगे।
महादेव यही नहीं रुके झूठी गवाही देनेवाले कब कपटी केतकी के पुष्प से कहा - तुम दुष्ट हो। आज के बाद से मेरी पूजा में उपस्थित तुम्हारा फुल मुझे प्रिय नहीं होगा। संसार में कोई भी तुम्हारे फूल से मेरी पूजा नहीं करेंगे।
उसके बाद ब्रह्मा जी और केतकी के पुष्प ने महादेव से क्षमा प्रार्थना की।
सभी देवतागण महादेव की स्तुति करने लगे।
Rashmi ~
0 Comments
Do not post spam links