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महानगरों की औरतें  (कविता


महानगरों के घरों से 
जब निकलती है वो 
बिखरी हुई लटों 
बेतरतिब कपड़ो में लिपटी हुई 
तेजी से बढ़ते कदमों 
की चाप 
शांत समंदर में 
पत्थर सी हलचल।

सुबह की धूप से पहले
रात की छांव तलक
भागा-दौड़ी उठा-पटक 
आसमां में गरजते बादल 
जैसे...
समय की सुई के संग 
दौड़ती हैं बिना रुके

महानगरों के घरों से 
जब निकलती है वो ...

मन की थकान 
मन में छुपाए 
कभी दूर 
कभी पास 
उलझनें इतनी 
जीवन है या नहीं 
शोर में गुम हो जाए।

महानगरों के घरों से 
जब निकलती है वो ...

समय की सुई से ज्यादा 
दौड़ती हैं बिना रुके
करती है वो
हर सफर पार 
इस तरह की
इल्म ही नहीं होता 
कब उसका सफर
सफर ही रह गया

महानगरों के घरों से 
जब निकलती है वो ...


Rashmi 

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