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मु्ददतों के बाद (कविता)

मु्ददतों के बाद





बड़ी मु्ददतों के बाद
तुम्हें पाया है
डर है कि तुम
फिर चले ना जाओ... 

करोड़ो सीपियों के बीच
तुम्हें ढुंढा है
डर है कि तुम
कहीं खो ना जाओ.... 

कोई राफ्ता कोई जिक्र नहीं
दिल पे खंजर या
खंजर पे दिल मेरा
खामोशी से कहीं 
घायल ना हो जाये... 

बड़ी इबादत से मिले हो
डर है कि फिर
तन्हा ना हो जाये
दिल मेरा... 

~ रश्मि



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