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इश्क की खुशबू (प्रेम कविता)

इश्क की खुशुब - प्रेम कविता




 इश्क की खुशबू कैसी है यारा
 तेरे जाने के बाद भी
 तेरा दीदार ख्वाबों में होता रहता है
 हमें तो लगा था
 हम तुम्हें भूल गए हैं
 मगर मेरे ख्वाब
 याद दिलाते रहते हैं
 कि तू मेरे जेहन में
 आज भी जिंदा है
 बरसों बीत चले हैं
 रिश्ते फना हो चले हैं 
 फिर भी तेरे इश्क की खुशबू
 हर चमन में महकती रहती है
 खुदा से ना तुझे माँगा
 ना मोहब्बत मांगी
 फिर भी ये क़ायनात
 तुझे आवाज देती रहती है
 इश्क की खुशबू कैसी है यारा
 तू है ना मैं हूं
 फिर भी गुलिस्ताँ महकता है सारा
 अब क्या ख्वाहिश
 जाहिर करूँ खुदा से
 मोहब्बत को एक मकाम
 मिल गया है...
 अब तो जाने की है बारी
 जन्नत मिले यह ज़हनुम
 खुदा से बस...
 मिलने कि तैयारी है बाकी
 मिट्टी कि काया
 मिट्टी हो जानी है
 रह जाना है सब यहां
 जमीं हो या आसमां
 इश्क कि खुशुब साथ चलती है
 ढूंढे जिसे जग सारा.....
 इसकी खुशबू कैसी है यारा


~कुमारी रश्मि



 

 



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