वो शब्दों का जाल बुनते हैं
मैं जीने की ख्वाहिश जताती हुँ
वो झुठ का महल खड़ा करते हैं
मैं प्रकुति की आगोश में
उसका साथ चाहती हुँ
वो महानगर के शोर में
आशियाना बनाना चाहता है
कितना बेमेल रिश्ता है
मगर प्रेम का यही
हर तरफ किस्सा है
कहीं जोड़-घटाव है
कहीं गुणा- भाग है
सब यहां देखा जाता है
ये तेरा है वो मेरा है
हमारा जैसा कुछ नहीं चलता यहां...
ना जाने कब प्रेम
कभी पानी के बुलबुले
की तरह गायब हो जाता है
कभी वाष्प बनकर उड़ जाता है
यहां कोई हीर -रांझा
सोनी - महीवाल
नहीं बन सकता है
प्रेम की पीर
कौई जगा नहीं सकता है
नाप - तौल का खेल
यहां चलता है
प्रेम कोई रहस्य नहीं रहा यहां
कुटविद्या की रेल चलती रहती है
तु नहीं तो तु ही सही
प्रयोग चलता रहता है
महानगर का प्रेम !
जीवन के कैनवास पर...।
~रश्मि
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