कल फिर कोई चला गया...
मानों कोई प्रतियोगिता चल रही हो...
शब्द अक्सर खो जाते हैं किसी के जाने से।
कभी-कभी किसी खास के जाने से शब्द मिलते नहीं , क्योंकि वह अहसास शब्दों से पड़े दुनिया की होती है।
पर कुछ लोग होते हैं उन्हें शब्दों में उकेरा भी जा सकता है, एहसासों की चादर में लिखा भी जा सकता है।
साल से ज्यादा हो चला...
अलबेला - खुशदिल - रब का बच्चा..
'ना' शब्द तो उसकी पोटली में था ही नहीं।
कुछ रिश्ते अलग होते हैं क्योंकि कुछ लोग भी खास होते है।
मानो मैं उसकी सीता वह मेरा लक्ष्मण..
आज्ञा मिलने की देर नहीं कि बंदा हाजिर....
ना दिन की चिल चिल्लाती धूप देखी ना शाम का अंधेरा..
दौड़ पड़ा यूँ, मानो मेरी ख्वाहिश उसकी ख्वाहिश।
हां भाभी कहां चलना है
हां भाभी क्या लाना है
हर सुख दुख का साथी या रिश्ता, जो भी कहूं कम ही लगता है।
चाट खाने चलना हो या फालूदा....
पेमेंट तो वही करेगा सबका,
चाहे रिश्ते में छोटा ही क्यों ना हो...
एक दुकान से दूसरे दुकान एक शहर से दूसरे शहर वही तो ले जाएगा। मायके से ससुराल और ससुराल से मायका, चक्कर तो वही लगायेगा।
तीज त्यौहार हो या कोई और उत्सव अपने हाथों से घर को सजायेगा।
बिंदी- चूड़ी - गजरा सब वही तो मेरे लिए लायेगा।
भाई का आदेश हो और उसका पालन ना हो, ऐसा हो सकता है क्या...
कहने को चचेरा देवर अपनों को भी मात दे देता था....
खाने में उसे चावल पसंद नहीं था ,घर में त्यौहार होने पर 15 - 20 लोगों के होने से बेसमय में खाने वाले को पसंद का खाना कहां मिलता है...
कभी रोटी तो कभी सब्जी कम पर ही जाती है।
पर मेरी दिनचर्या में शामिल था, उसके लिए रोटी सब्जी छुपा कर अपने कमरे में रखना....
ताकि जब वह खाना खाए तो उसकी पसंद का हो....
भले ही मुझे सहना पड़ता घूरती हुई कई जोड़ी आंखें। कभी -कभी दो चार बातें, कभी ननदों के उलहानें...
पर लाडला था वह मेरा कोई जले तो जले परवाह कहां किसे...
तस्वीरों की बात हो तो त्योहारों में फोटोग्राफर तो वही बन जाता था ।
अब उसके बिना ना त्यौहार अच्छे ना छठ का घाट अच्छा।
लिखना तो बहुत कुछ है पर शब्द छूट रहे हैं ...
सबसे कहा करते थे हम - "कोई भी मुसीबत होगी तो उसी को फोन लगाएंगे।"
क्योंकि मुझे पता था वह एक आवाज में हाजिर होगा ।
देवर हो कर भाई जैसा, इतना प्यारा रिश्ता था....
लोगों के साथ- साथ तस्वीरें भी अक्सर खो जाती है इसलिए तस्वीरों के साथ...
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