अनकही सी मोहब्बत
अनकही सी मोहब्बत
अनकही ही रहती
तो अच्छा रहता
कहने से बिखर गई
इधर - उधर
जाने किधर - किधर
ढूँढ रही मैं
तितर - बितर ,
होने ना होने के
उलझन में
उलझ रही
जगह - जगह...
अनकही सी मोहब्बत
कहने से
कभी खामोशी के सिरहाने में
कभी आँसूओं के
बहने - कभी पीने
के रेले में....
Rashmi~
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