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अनकही सी मोहब्बत (poem)

 अनकही सी मोहब्बत



 अनकही सी मोहब्बत
 अनकही ही रहती 
 तो अच्छा रहता
  कहने से बिखर गई
  इधर - उधर
  जाने किधर - किधर
  ढूँढ रही मैं 
  तितर - बितर , 
  होने ना होने के
  उलझन में
  उलझ रही 
  जगह - जगह... 
  अनकही सी मोहब्बत
   कहने से
   कभी खामोशी के सिरहाने में
   कभी आँसूओं के
   बहने - कभी पीने
   के रेले में.... 

Rashmi~
    
 

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