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मुद्दत हुई (poem)

मुद्दत हुई



तुम नहीं आओगे

इल्म था हमें

मुद्दतें पहले ही

तुम्हारी बे-आराम देह

बहुत कुछ बयाँ कर गई थी

पर दिल है कि तस्लीम नहीं करता

वो क़वानीन व ज़वाबित से वाक़िफ़ नहीं.... 

इंतजार करना तो इनके लिये

इबादत की तरह है...

मगर तुम शाद-ओ-आबाद रहना

हमें तो अज़ब में रहने की आदत है... 


Rashmi ~


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