मुद्दत हुई
इल्म था हमें
मुद्दतें पहले ही
तुम्हारी बे-आराम देह
बहुत कुछ बयाँ कर गई थी
पर दिल है कि तस्लीम नहीं करता
वो क़वानीन व ज़वाबित से वाक़िफ़ नहीं....
इंतजार करना तो इनके लिये
इबादत की तरह है...
मगर तुम शाद-ओ-आबाद रहना
हमें तो अज़ब में रहने की आदत है...
Rashmi ~
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