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मन (कविता)

मन (कविता) 


मन को
तरह - तरह
से समझाया
कभी फुसलाया
कभी बहलाया
बात नहीं बनी तो
कभी डांटा
कभी फटकारा
सौ - सौ उलहाने
दिये खुद को
सौ - सौ जतन 
किये खुद पे
समझदारी की सीख
वक़्त की नजाकत दी
पर मन है 
कि मानता ही नहीं... 

~रश्मि

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