राजनीति की प्रयोगशाला (हिंदी कविता)
समाज हो या राजनीति
सच कहाँ बचा है..
सच तो गांधी के साथ चला गया
राम राम कहने वाले
धर्म का चोला औढ़
चाकू - भाला लिए खड़े हैं...
दूसरे को सत्य का आईना दिखाने वाले
झूठ की चादर लिपटे खड़े हैं
पूजा-पाठ और मंदिर की घंटी बजा
धर्म का दुशाला औढ़
राजनीति के अखाड़े में खड़े हैं...
धर्म तो राजनीति की प्रयोगशाला हो गई
जनता प्रयोगशाला के 'सामान' हो गये
पत्रकार और पत्रिकारिता तो बंधक पड़े हैं...
अखबारों की खबरें
अब एडवरटाइजमेंट हो गई है
समाचार और खबरों के लिए
चौराहा और नुक्कड़ ही बचा है
पता नहीं कब यह भी जगह
झूठ का पुलिंदा हो जाए
सोच पर तो पर्दा पड़ा है...
जब हमारे दिलों-दिमाग भी हाईजैक हो जाये
तो खाना पीना हँसना बोलना
पिंजरे में तोता हो जाये
तो बिल्ली उड़ - गधा उड़ भी हो जायेगा
फिर हमारे बुद्धिमत्ता के झंडे गड़े होंगे
आत्ममुग्ध हम बंदर सारे
उछल कूद हम क्या शोर मचाएंगे
पिंजरे में कैद आत्मा सारी
बस हाथ पैर ही खुजायेंगे...
सच कहा बचा है
सच तो गांधी के साथ चला गया।
~रश्मि
2 Comments
आपकी भावना को नमन। सच से भरी है कविता आपकी।
ReplyDeleteशुक्रिया 🙏
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