किताबों की बातें नहीं होती
अब ना कहानी की बात होती है
ना उपन्यास की बात....
ना साहित्य की चर्चा
ना साहित्यकार की....
बातें होती है बस
रोज नये फैशन
रोज नये खेल की
खेल राजनीति का हो या घर का
पर चर्चा नहीं होती किताबों की.....
अब ना कोई किताबों से बातें करता है
ना कोई किताबों पे चर्चा करता है
चर्चा होती है फिल्मों-टीवी-वेबसीरिज की
अब ना किताबों की चंद लाइन
डायरी में लिखी जाती है
ना उसका अर्थ ढूँढा जाता है
ना उसका भाव...
अब ढूंढने पे भी नहीं मिलती
किताबों की आलमारी....
कभी हर घर के हर कमरे में
हुआ करता था
एक कोना किताबों का....
किताबों को सजाया जाता था
संवारा जाता था
चढ़ाई जाती थी नई-नई जिल्द
और अलमारी पर सज जाती थी किताबें
अब अलमारी पे सजाई जाती है शोपीस..
कभी किताबों को पढ़कर
कल्पना के उड़न-खटोले पे बैठ
देश दुनियां की सैर कर लेते थे
कभी परियोँ के देश घूम आते थे
तो कभी अंतरिक्ष की दुनियां टहल आते थे
तो कभी कल्पना करते करते
कोई नया अविष्कार कर डालते थे
अब किताबों की दुनियां सिमट गई है
हमारी बौद्धिक सोच के पँख छोटे होते जा रहे हैं
इसलिए कह दे कोई रेयांश
चूहा उड़ तो चूहा उड़ जाते हैं
बंदर उड़ तो बंदर उड़ जाते हैं
छल समझो या प्रपंच या अविवेक
हमारी बुद्धि का दिवालिया निकल गया है
या निकाल दिया गया है...
इंटरनेट की आभासी दुनियां ने
सारी किताबों को पुस्तकालय में छोड़ दिया है
अब ना प्रेमचंद की बात होती है
ना फणीश्वर नाथ रेनू की...
भारतेन्दु , रसखान, कबीर, तुलसीदास कौन है
आने वाली पीढ़ी पूछेगी भी नहीं...
क्यूंकि किताबों के लिए हमने
घर के दरवाजे बंद कर दिये....
~रश्मि
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