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टूटे रिश्ते की सालगिरह ( कविता )

टूटे रिश्ते की सालगिरह ( कविता )





भोर की किरणों तले 

कुछ ख्वाब थे 

कुछ ख्याल थे 

हैरान - परेशान 

सुनी - सुनी थी फ़िज़ा 

मैंने चुपके से 

छू लिया उन्हें 

यूँ बिखर गये वो 

ओस की बुँदे 

पत्तों पर जैसे 

हवा गुजरी 

और बयां हो गये 

हवाओं का दर्द 

मैं हंसी 

छलक पड़ी फ़िज़ा 

फिर हमारे साथ

दरों - दीवारे 

जमीं -आसमां 

बारिश और बुँदे 

सब हंसने लगे 

दर्द की हसीं 

हमने मिलकर मनायी 

टूटे रिश्तों की सालगिरह 

टूटे रिश्तों की सालगिरह.....



रश्मि 


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