जो रहगुजर गया (प्रेम कविता)
उसे क्या याद करना
शक्ल क्या कहे
अब तो आवाज़ भी
गैर हो गयी....
पैशानियों के सैलाब में
उसका ख्याल बह गया
यूँ ......
कि बेख्याली में भी
जो सामने आ जाये
और कहे -
वही मुसाफिर हूँ
मगर दिल पहचानने से
इनकार ना कर दें...
राह बदलने से
रूह भी तो बदल जाती है
तो इख्तियार कैसे कर लूँ
तुम वही हो....
कुछ कदम चलते-चलते
मोड़ आ जाये तो
राहें बदल ही जाती है
हसरतें बदल जाती है
कारवां साथ हो कर भी
मुकद्दर अलग हो ही जाता है...
अब मैं कौन हूँ
तुम कौन हो
आईना कहे-
पहचान बदल गई
अब क्या सोचना
काश ऐसा या वैसा होता
ये सवाल भी मिट्टी पा गया...
सामने खड़ा दमकता सूरज
नये पँख लिये खड़ा
अब तो बस उड़ान कि बारी है
जो रहगुजर गया
उसे क्या याद करना......
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