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रिश्ते ( Rishtey ) हिन्दी कविता

रिश्ते  (कविता )






रिश्ते कैसे रिश्ते होते हैं
कभी धूप में जीते हैं
कभी छांव में मरते हैं
 कभी अकेलेपन के भय से
 कभी अपनेपन की तृष्णा में 
 कभी दूर
 कभी पास
 भागते हैं हम
 रिश्तो के पीछे
 और
 रिश्ते हमारे पीछे....
 कितना अचंभित
 हो जाता है मन
 जब रिश्तो में,
 तरलता की जगह जमाव
 आता जाता है...
 तब कितना अजीब लगता है
 संबंधों को बंधनों में बांधना
 फिर भी
 हम भटकते हैं
 उन्हीं के आसपास
 कुछ खोकर
 कुछ पाने के लिए
 यह खोना
 अस्तित्व को खोना तो नहीं ?
 रिश्ते कैसे रिश्ते होते हैं...

~रश्मि 

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