आदमियों की भीड़ में (कविता)
आदमियों की भीड़ में
जिधर भी देखा
खुद को तन्हा ही पाया
मन के आईने में
हर शख्स का अक्स
मुखौटा ही नजर आया
जरूरत के हिसाब से
चेहरे को बदलते रहना
शायद....
वक्त-बाजार व रिश्तों की
जरूरत बन गया है
मुखौटों के साथ जीना
अब
इस दुनियाँ का दस्तूर बन गया है....
असल चेहरों के साथ जीना
अब लगता है मुश्किल
आदमियों की भीड़ में
जिधर भी देखा
खुद को तन्हा ही पाया
नकाब ओढ़े-ओढ़े
लगता है....
रूह कहीं खो गई
ख्याल बस एक ही उपजता है
अपने ही अक्स को दबा रहे
आत्मा को जला रहे
इंशा सारे...
इंसानियत तो अब
फना हो गई
अब ना सच है कहीं
ना सचाई
झूठ का पुलिंदा
फैला हुआ है
समेटने को ना बचा कोई
अब जिगर रहा ना जिगरा
शेर की खाल में
गीदड़ घूम रहे सारे
आदमियों की भीड़ में
जिधर भी देखा
खुद को तन्हा ही पाया
~रश्मि
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