क्या नेता क्या अभिनेता
क्या समाज क्या अपने
सबकी उम्मीदें भारी-भरकम
बोझ तले दबा जा रहा
हाड़-मांस का एक आदमी साला...
खून पिचासु राक्षश सारे
कभी इधर कभी उधर
खून पीते नाच रहे हैं
क्या मंगल क्या शनि
सारे ग्रह है हम पर भारी
लोग क्या कहेंगे
लोग क्या ना कहेंगे
इसी फिक्र में
जिंदगी गुजर रही
बैलगाड़ी जैसी......
खुशियां और सपने
दीवारों में बंद हो रहे हैं
अपने सपने अपनी राह
कुछ भी ना अब बाकी रहा
रिश्तों की ख्वाहिशें
पूरा करते-करते
जिंदगी का फलसफा
खत्म हो रहा है...
मगर ए जिंदगी
लोगों की नामुराद
उम्मीदें खत्म नहीं होती है...
शौक बहुत है लोगों को
पर शौक पूरा करने के लिए
हाथ नहीं उठते अपने दमों पर
पर दूसरे के हाथ पर
टकटकी लगाए देखते हैं लोग....
ना हो अगर उम्मीदें पूरी
या थोड़ी देर हो जाए
मुंह नाक आंख कान
सब गुस्से से बुदबुदआते हैं....
हम बदल गए हैं
ऐसी तोहमत लगाते हैं लोग
पर खुद को बदलने की
जहमत नहीं उठाते हैं लोग
मेहनत किसकी किस्मत किसकी
पकाए कोई, खा जाए कोई
लगता है हम किसान हो गए
उगाए कोई, काट जाए कोई...
अब क्या कहे किसी से
जिसकी लाठी उसकी सरकार
सच पर तो छापा पड़ा है
झूठ सीना तान चला है
अब किस दर पर फरियाद करें
भगवान के दरवाजे भी
हिंदू-मुस्लिम मंदिर-मस्जिद
में बंद पड़े हैं....
बोझ तले दबा जा रहा
हाड़-मांस का एक आदमी साला...
~रश्मि
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