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मंदिर-मस्जिद (कविता)

मंदिर - मस्जिद 



क्या मंदिर – मस्जिद करते हो
इक दिन खाक में सबको मिल जाना है
क्या मंदिर – मस्जिद करते हो

सबके लहु का रंग एक
सबके लहु का प्रवाह एक
वही हृदय और धमनियां
क्या मंदिर – मस्जिद करते हो

सबका वही आहार – विहार
वही फेफड़े वही अंतरियाँँ
फिर क्यों मार – काट की बात करते हो
क्या मंदिर – मस्जिद करते हो

हवा दुषित- जल दुषित – भूमि दुषित
इसकी बात क्यों नहीं करते हो
क्या धर्म के नाम पे मन प्रदुषित करते हो
क्या मंदिर – मस्जिद करते हो ।
~रश्मि

मेरी यह कविता "मंदिर-मस्जिद"  शीर्षक से 19-11-2019 को साहित्यपीडिया में प्रकाशित हो चुकी है।

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