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झूठ की कहानी ( कविता)

थोड़ी सी रोशनी भी बहुत होती है 
सच को सामने लाने के लिये 
बेख्याली में निकले अल्फाज 
भी सच बयां कर देते हैं 
झूठ तो पैबंद है 
उतर ही जाता है 
चेहरे की रोशनाई भी
उकेर देती है 
सारी गाथा
माथे की शिकन
सब साफ कर देते हैं 
झूठ कि परत
इसलिए रिश्ता जो निभा ना सके 
बनाना ही नहीं चाहिये 
वादे पे कायम ना रह सके
खाना ही नहीं चाहिये 
कसमें मां-बाप की 
झूठी दोहरानी नहीं चाहिये 
करमा घुम फिर कर 
वापस ही आता है हुजूर 
झूठ के महल बनाओगे 
तो दफन भी 
उसी में हो जाओगे ।
~रश्मि 






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