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जब कोई खिड़की खुलेगी (कविता)

होती हैं बातें 
जीवन में बहुत कुछ...
कठिनाइयों से हार मान
थक-हार के....
एक आग जलती है - सीने में
धधकता है मन
और धुंआ हो उठता है तन
रह-गुजर  कहती है - मुझसे
तो क्या सांसों को तोड़ दुं
दुनियां युं छोड़ दुं
फिर सोचता हूं
मेरे जाने से
किसका क्या नुकसान होगा
कुछ पल का किस्सा होगा
फिर सब बातें तमाम होगी
ना कोई याद करेगा
ना कोई फरियाद करेगा
होता है जरूर दुख
होता है जरूर दर्द
कभी भुख से ऐंठती हैं आंतें
कभी छत से टपकता है पानी
कभी बह जातें हैं घर
कभी बह जातें हैं रिश्ते - नातें
अपना पराया सब मुंह फेर ले
सबके चेहरे प्रश्र वाचक लगे
तो क्या दुनियां छोड़ दुं ?
फिर ख्याल हो उठता है
हर तरफ से
घुमड़ - घुमड़ कर उठते हैं - प्रश्र
 जब जन्म अपने वश में नहीं
तो मृत्यु का वस्त्र क्यों धारण करूं
टुटता है तो टुटे
बहता है तो बहे
आज रास्ता नहीं है तो क्या
जब कोई खिड़की  खुलेगी
तब कोई दरवाजा भी खुलेगा
फिर आसमान में रोशनी भी होगी
फिर कुछ बरसात भी होगी...
~रश्मि


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