बस् गुनगुनाने के लिये
इसका ना आदि होता है
ना अंत....
ना तात्पर्य होता है
ना महत्व
बस् गुनगुनाने के लिये
होती हैं कुछ कविताएं....।
ये कविताएं
ना हृदय में प्राण फुँकती हैं
ना उत्तेजना
ना हृदय को उद्विग्न करती है
ना देश प्रेम की उदघोषणा करती है
ना शोषकों की रक्षक बनती है
ना पोषकों की ढ़ाल
बस् गुनगुनाने के लिये
होती हैं कुछ कविताएं.....।
ये कविताएं
ना वीर रसों का पान करती है
ना शौर्य गाथाओं का बखान करती है
बस् होती हैं गुनगुनाने के लिये.....।
किशोरावस्था में जो कही जाती है
चाँद - तारे तोड़ लाने की बात
बादलों संग छुपने रुठ जाने की बात
आकाश में ऊंची उड़ान भरने की बात
जाने कब...
जीवन की आपाधापी में
अनगिनत उग आये
जीवन के झंझावातों से
जब खुद को भुल जाते हैं
तब ये कविताएं होती है
मनुष्य के वो भाव
जिन्हें वो सबसे छिपाता है
अकेले में गुनगुनाता है
राह चले मुस्कुराता है
जब होठों पे जो शब्द
कविता बन गुनगुनाते हैं
तब..
कुछ कविताएं बनती हैं
बस् गुनगुनाने के लिये...।।
~रश्मि
1 Comments
अति सुन्दर
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