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तुम जो चाहो सो करो ( कविता )

तुम जो चाहो
सो करो
तेरी हुँ 
तेरी ही रहुँगी
तेरे ही दर पे 
मेरा आशियाना होगा

मानो या ना मानो
मेरा ही मुक्ददर
मेरा ही याराना होगा
लाख चाहे इंनकार करो
तेरे दिल में
मेरे दिल की ही
अरदास होगी

तुम जो चाहो
सो करो
मेरी ही जमीं
मेरा ही आसमान होगा
छुप जाओ चाहे
बादलों के बीच
बारिश की बुंदे
मेरी हथेली पे ही होगी

तुम जो चाहो
सो करो
उगता सुरज भी कह रहा
तेरे ही छाँव में
मेरा ही बसेरा होगा
मानो या ना मानो
तेरा ही चेहरा
मेरा आईना होगा

तुम जो चाहो
सो करो
परवरदिगार के दरबार में
मेरी ही कहानी गुँजेगी
जाओगे कहाँ
हवा की तरह
साँसों में महक जाऊँगी
फिर ना कौई 
जाने की बात होगी
ना छुटने का एहसास
तुम जो चाहो
सो करो....

~रश्मि

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