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तुम सब मजदूर बन जाओगे (व्यंग्य कविता)

जब एक दिन सारे मजदूर मर जायेंगे
तब तुमसब मजदूर बन जाओगे
तब मन को बना लेना पत्थर
तब हाथों को बना लेना फौलाद
ताकि अपने घरों का निर्माण खुद कर सको
ईट-पत्थरों से दीवार खुद खड़ी कर लेना
पर भुलना नहीं ईटें भी तुम्हें खुद बनानी होगी
नहीं तो झोपड़ी में रहने की कला सीख लेना
जब एक दिन सारे मजदूर मर जायेंगे
तब बिजली - पानी  खुद बना लेना
नहीं तो नदी-तालाब से पानी ले आना
चांद की रोशनी से घर में उजाला भर लेना
और हवा जब चले तो नींद ले लेना
नहीं तो बिजली-पंखा- और साफ पानी
बनाने की कला सीख लेना
जब एक दिन सारे मजदूर मर जायेंगे
तब रोटी के लिए किसान के पास जाना
तब पैरों में छालें भी पड़े तो बर्दाश्त करना
नहीं तो आवागमन के लिये वाहन खुद बना लेना
आने जाने के लिये राह भी खुद बना लेना
नहीं तो फिर अनाज खुद उगा लेना
तब तुम्हें फिर खुद बनानी होगी जमीन
तोड़नी होगी तुम्हें गगनचुंबी इमारतें 
इतना भी ना कर सको 
तो आदिमानव बन जाना
उसके लिये भी तुम्हें बनाना पड़ेगा जंगल
जब एक दिन सारे मजदूर मर जायेंगे
नदी नालों की सफाई खुद करना
बन जाना सफाई कर्मचारी
नहीं तो रह लेना कचरे व मल के साथ
जब एक दिन सारे मजदूर मर जायेंगे
अपने बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ
उनके शरीर और मन को पत्थर बना देना
और हर कला में निपुण करना
जब एक दिन सारे मजदूर मर जायेंगे
तब तुमसब मजदूर बन जाओगे
और कहलाओगे आत्मनिर्भर
तब अगर फुरसत मिले
तब दीये जलाना घंटी बजाना
फिर अपने शासक को कहना फुल बरसाये।।
~रश्मि










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