मुझे याद नहीं था हमेशा की तरह, मुझे ना तो किसी का जन्मदिन याद रहता है ना किसी की शादी की सालगिरह ना ही कोई और दिन पर लोगों के साथ बिताये हुये पल हमेशा याद रहते हैं और याद आते हैं।
दादा - दादी तो हमेशा याद रहते हैं। दादी जब भी याद आती है आँखों में आँसू नहीं आते बल्कि होठों पे मुस्कान आ जाती है। क्योंकि हमारी दादी थी ही ऐसी। बहुत मजेदार कहानियां सुनाया करती थी खुद के बारे में। आज भी याद करती हुँ दादी के साथ बिताये पल तो बरबस हँसी आ जाती है।
दादी के किस्से तो कई हैं जिन्हें एक बार में समेटना बहुत मुश्किल है। खैर थोड़ी सी कहानी तो बता ही सकती हुँ। दादी की थोड़ी आयु ज्यादा हो गई थी तो वो थोड़ी बच्चों जैसी हो गई थी।कहते हैं ना बुजुर्ग और बच्चे एक जैसे हो जाते हैं।
हमसब भाई - बहन जब छुट्टियों में गाँव जाया करते थे तो जब भी मन नहीं लगे तो दादी के पास बैठ कर , दादी को छेड़ देते थे कि दादी अपनी शादी का किस्सा सुनाओ ना। तब दादी की होठो पे रौबदार मुस्कान आ जाती थी, शरीर तन जाता था और वो सर के पल्लू को ठीक करती किस्से सुनाना शुरू कर देती थी। पल्लू से ध्यान आया कि याद नहीं कि दादी कभी सर से अपना पल्लू गिरने देती थी।
खैर दादी की भुरी -भुरी आँखें चमकती और कहानी शुरु..... दादी कहती जब उनकी शादी हूई तो दादा जी दस - बारह साल के थे वो सात आठ साल की। हमलोगों को विश्वास नहीं होता था कि इतनी छोटी उम्र में दादा - दादी की शादी हुई। पर हमलोग बहुत मजे लेकर कहानी सुनते।
हमलोग कहानी सुनते - सुनते दादी को उकसाया भी करते थे और कहते थे छोटकी दादी की शादी में तो घोड़ा मिला था फिर तो दादी आगबबूला हो जाती बोलती उसे तो अच्छा घोड़ा भी नहीं मिला।मेरे दादाजी जी दो भाई थे तो हमलोग उन्हें छोटका दादाजी और उनकी पत्नी को छोटकी दादी कहते हैं।
फिर दादी आगे कहती मेरी शादी में तो हाथी मिला और उसको घोड़ा। मेरा हाथी अच्छा था उसका घोड़ा अच्छा भी नहीं था। हमलोग मंद - मंद मुसकराते रहते और उनकी बालसुलभ मुस्कान को देखते। छोटकी दादी भी उधर हंसती रहती। दादी और छोटकी दादी में मीठी तकरार कितनी भी हो वो एक दुसरे से प्यार बहुत करती थी।
वैसे अब मैं सोच रही हूँ कि घोड़े का तो इस्तेमाल हो ही जाता था बग्गी में, पर हाथी का क्या करते होगें..........? आज हमलोग अपने बच्चों को हाथी - घोड़ा दिखाने चिडियाघर ले जाते हैं। हमारे बुजुर्ग हाथी - घोड़ा घरों मे पालते थे। पता नहीं आने वाले दशकों मे गाय- भैंस भी चिडियाघर में देखने जाना पड़े..... क्रमशः
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