अनकही मोहब्बत
ना तो तुम बैरी
ना ही कुछ और
फिर भी ना जाने क्यों
मेरे ख्वाबों में
तुम्हारा आशियाना है...
सोच कर दिल धड़क उठता है
फिर तुमसे मोहब्बत की
कहीं कोई क्षणिक सी तो नहीं
सुलग रही है, धीमी आंच
कहीं पक तो नहीं रही
मोहब्बत की चिंगारी.....
ना तो तुम सखा हो
ना तो तुम बैरी
ना ही कुछ और
मगर दिल है की
समझता नहीं
बात मेरी ये मानता नहीं....
मोहब्बत में फना हो सके
यह वक्त अब रहा नहीं
ना तुम रहे ना हम रहे
मैं इस गली
तुम उस गली
रास्ते सारे लापता हो चले ....
रूहानियत मोहब्बत की
अब कोई समझता नहीं
एकतरफा इश्क की दास्तां
अब कोई कहता नहीं
सीने से लगे
तो वक्त थम जाये
ये महसूस करता नहीं कोई.....
अनकही मोहब्बत की गजल
अब कोई सुनाता नहीं
सब भाग रहे
मृग मिरीचिका के पीछे
सामने कोई देखता नहीं...
ना तो तुम सखा हो
ना तो तुम बैरी
ना ही कुछ और
फिर भी किसी
अधूरी कहानी का हिस्सा हो
मगर दिल जानता है
तुम तो किसी और के इश्क
का किस्सा हो
किसी की याद हो
किसी की ख्वाहिश हो ....
~रश्मि
0 Comments
Do not post spam links