दिल और दिमाग की गुफ्तगू ( प्रेम-कविता )
दिमाग ने दिल का हाथ थाम रखा है
दिल बेचैन है
कटी पतंग की तरह
छटपटा रहा....
दिमाग क्रोध से तमतमा रहा...
दिल कहता है - जाना है
उस ओर
जहां धड़कने कैद है
एक बार कुछ पल
बस कुछ पल के लिए
फिर कभी ना जाऊंगा
अंतिम बार
अंतिम बार
दिमाग दिल को मसल देता है
फिर कहता है - कहां जाना है
उस कठोर हृदय के पास
जिसने हलक से खींच-खींचकर
प्रेम - खुशी - सुकून -जीवन
सब छीन लिया
जिसने तुम्हारी अंतरियों
तक घुसेड़ कर रख दी
दर्द की तेजाब
जिसमें जल गया वजूद
छिन्न-भिन्न हो गई
भावनाएं और जज्बात..
जो जला कर चला गया
तेरी आंखों में
आंसुओं की अखंड ज्योत
चिथड़े - चिथड़े उड़ा दिये
जिसने विश्वास की चादर...
दिमाग का भाषण चलता रहा
और दिल सोचता रहा
उससे मिलकर धड़कने
धड़कने लगेगी
उससे बात कर
जिंदगी निखरने लगेगी
मिन्नतें करूं तो शायद
रहम कर
मन का सुकून
रात की नींदे
आंखों की मुस्कान
ज्यादा ना सही
थोड़ा तो देगा....
दिमाग दिल को झकझोरता है
पी रखी है क्या ?
ज्यादा ना बहक
अपनी औकात में रह
दिल खामोश सा
चुपचाप सा
आंखों की गंगा जमुना बहता हुआ
कसकर थाम लेता है कदमों को
दिमाग कहता है - अच्छा है
थोड़ा और मर ले
आत्म-सम्मान को मारने के बदले...
दिल कहता है -
तुम नहीं समझोगे
तुम्हारी तो फितरत है
हिसाब-किताब करने की
बैठ जाते हो गुणा-भाग करने
यह दिल का रिश्ता है
जीवन का अर्थशास्त्र नहीं
प्रेम में मान-सम्मान अहम होता नहीं
प्रेम - भूत - भविष्य जानता नहीं
वर्तमान में जीता है
वर्तमान में मरता है
प्रेम की दुनियाँ में
दुनिया विलीन हो जाती है
रूह रह जाती है....
~रश्मि
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