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छानते रहिये-छांटते रहिये - कविता

छानते रहिये-छांटते रहिये (हिंदी कविता)





जीवन में सुकून की चाहत थी
पर बार बार अनेकों बार
मुँह में आ जाते थे
झूठ फरेब पाप के कंकर-पत्थर
तो मैंने उसे छान लिया.... 
तो क्या बुरा किया
अपने आसपास के
झूठ फरेब स्वार्थ जैसे कचरे को
चलनी से चाल लिया....
दुख हो किसी को तो क्या करें
बुझा दीपक झूठ का तो क्या करें
अव्यवहारिक लोगों की छँटनी हो गई तो क्या करें.... 
शरीर में कोलेस्ट्रॉल जमा करने से क्या होगा
मधुमेह बढ़ जाए तो क्या करे 
इलाज जरुरी हो जाता है
इसलिए छानना जरूरी हो जाता है
बार बार अनेक बार.....
चुनना-बिछना जरुरी है
वरना आत्मा में चुभते रहते हैं
छानिये तब-तक 
जब-तक सारे कंकर पत्थर निकल ना जाये
सकारात्मक शक्ति का वास ना हो जाये...
रूह के आसपास शांति का निवास ना हो जाये 
सच्चाई की दिवार मजबूती से खड़ी ना हो जाये 
साफ पानी की चमक आँखों में समा ना जाये ...
तब तक छानना भी जरूरी है
खुद को याद दिलाते रहिए 
छानते रहिये छाँटते रहिये...

~रश्मि 




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