अकेलापन - हिंदी कविता
अक्सर घर के सन्नाटों की
आवाजों से घबराकर
रेडियो से
दो-दो हाथ करती हूं
उंगलियों की हरकत
उसकी सुईयों को
इधर से उधर
घूमाती है
दो-चार घंटो बाद
रेडियो पर बजता संगीत
शोर लगने लगता है
और मन बेचैन
रेडियो बंद होता है
तो खुद के भीतर
खामोशी का शोर
सुनाई देता है
डर जाती हूं
रेडियो बजने लगता है
फिर
घर का सन्नाटा
बाहर का शोर
मन की खामोशी
सब एक साथ
चीखने लगते हैं..
~रश्मि
4 Comments
बहुत सुन्दर सृजन.
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deleteअपनी आवाज़ ही खामौशी तोडती है अनेक बार ... और शोर भी करती है ...
ReplyDeleteअच्छी रचना है ...
बहुत बहुत आभार
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