क्या सच में
अजीब सी लहर हैमोहब्बत में
जैसे शीत की लहर हो
फटे कंबल में...
जैसे भुख की लहर हो
ऐंठती अंतरियों में
तो क्यों ना
ये मोहब्बत
बेफिजूल हो जाये...
खाली पेट
खाली तन
के रेगिस्तान में....
खुमार जब निकल जाये
तब खाली थाली
बजती है उदर में.....
तब मोहब्बत के अरमानों का
आशियाना भी भरभरा उठता है
जिन्दगी के सफर में....
चाहे खुन से लिखे जाते हो चिठ्ठीयां
चाहे वर्षों का इंतजार हो
एक झलक पाने की ख्वाहिश हो
कसमें वादें निभाने की तमन्ना हो
पर इश्क का जूनून
पेट की भूख से
हार जाये तो क्या
भूख से इश्क
हार जाये तो क्या....?
~रश्मि
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