एक तरफ
गोभी मटर की बहार है
सरसों का साग है मक्के की रोटी है
गुड़ की चाय में अदरक का स्वाद है।
थोड़ी सी ठिठुरन है
अलाव का ताप है
थोड़ी मीठी सी धुप है
थोड़ी गीली सी धरती है
बच्चों को शोर है
संता के तोहफे की बरसात है।
दिसंबर का महीना है
बुजुर्गों की हिदायतें हैं
मां और दादी के हाथों में
बुनाई के नये-नये किस्सें हैं
रोज नये बनते पकवान का स्वाद है
चलो दिसंबर तुम्हारा स्वागत है
दूसरी तरफ
दिसंबर का महीना है
बेघर लोगों के लिए आफत है
ना घर है ना छत है
फटे कपड़ों-फटे कंबलों से
ठंड को ढ़कने की नाकाम कोशिश है
दिसंबर का महीना है
देह की ठंड और भुख की आग
दोनों मिलकर एक प्रश्न उठाते हैं
कौन जरूरी कौन गैरजरूरी !
यहां ना मक्के की रोटी
ना सरसों का साग
यहां भुख है या ठिठुरती देह
यहां किसी संता की आस नहीं
फिर भी दिसंबर चलो तुम्हारा स्वागत है...
~रश्मि
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