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किसान (कविता)


अपने खुन से उगातें हैं जो अन्न
वो आज हैं 
सरकार के नजर में सामान
सबकी मुख मिटाने वाले की
उन्हीं की भुख की बोली 
लगा रहे हैं 
हुक्कु्मरान.....

पशु पक्षी संग केवल पिक्चर खिंचवाने से
पशु पक्षी हमसे प्रेम नहीं कर सकते
सैनिक वर्दी केवल पहन लेने से 
सैनिक की अदम्य शौर्य और शक्ति 
हममें नहीं आ सकती है
तो उसी तरह
खेतों में फवारे चलाते हुये
फोटो किल्क करवाने से
हम किसान नहीं बन सकते
ना किसानों की परेशानी
ना दर्द समझ सकते.....

जो किसान नहीं वो क्या जाने
खेतों में कैसे बोये जाते हैं बीज
कैसे सींचें जातें हैं फसलें
कंपकंपाती शीत लहर में
हाड़ मांस की देह को 
कभी अलाव से कभी कंबल से
गर्माते हुये
कैसे की जाती है फसलों की रखवाली
महलों में बैठने वाले क्या जाने....

कभी कीट-पतंगें नष्ट कर देतें हैं
 कभी धुप झुलसाती है फसलों को
कभी बेसमय की बारिश कर जाती है
फसलों को बेहाल
इन सब से बचाता हुआ किसान
फसलों को ले जाता है मंडी तक......

वहां से निकल अन्न 
बुझातें हैं हमारी पेट की क्षुधा
और गद्दी पे बैठे हुकुमरान
बैचने का अधिकार भी छीन लें...?

वाह रे सरकार
वाह रे किसानों के तथाकथित कद्रदान
तुम्हारी चतुराई देख
अंग्रेज भी शरमा जाये...

भारत माता के नारे लगाने वाले
धरती की हरियाली 
देने वाले पे ही पानी बरसाते हो
ऊपर बैठा भगवान भी
कहता होगा कितना मेरे नाम पे
अपना राज चलाओगे........
वाह रे सरकार !
~रश्मि


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2 Comments

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