एक बिहारी
से हार नहीं मानते
जेब में सौ रूपये हो
हाथ में भुना चना का ठोंगा
लेकर भी दूसरे राज्य
कि खाक छान आते हैं
ट्रैन टिकट के पैसे ना हो
पर शौचालय के पास
अखबार डालकर
दुनियां नापने का हौंसला
रख आते हैं
प्रेम हो इतना कि
पहाड़ काट
रास्ता बना आते हैं
गणित की पहेलियों को
चुटकी में हल कर
दुनियां में नाम कर आते हैं
रोटी रोजगार के लिये
एक शहर से दुसरे शहर में
अपनी मेहनत का
हुनर पेश कर आते हैं
दुत्कारे जाने पर
अपमान का घुंट पी कर भी
अपनी सहनशीलता और सज्जनता
छोड़ नहीं पाते हैं
आत्महनन् क्या चीज है
इसे फुंक में उड़ा देते हैं
एक बिहारी कठिनाइयों से
हार नहीं मानते हैं...।
~रश्मि
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