1. पहली मुलाकात ( कविता )
कब आखिरी मुलाकात हो जाती है
पता भी नहीं चलता
कब मिले
कब टकराये
और बात हो जाती है
पता भी नहीं चलता
कब बिछड़े
कब दिल धड़का
और आँखों से आँसू छलके
पता भी नहीं चलता
पहली मुलाकात
कब आखिरी मुलाकात हो जाती है....।
2. राहगीर ( कविता )
राह चले जब कोई
युं ही कभी मिल जाता है
सफर हो छोटा मगर
साथ हो लेता है
तनिक हो जाती है
बातें भी इस डगर पे
कुछ अपनी कुछ उनकी
किस्से बयां किये जाते हैं
अपना ढ़का छुपा राज भी
उघड़ जाते हैं
राही ही तो है
फिर काहे का डर
मन की पीड़ा
मन के अरमान
और ना जाने कितनी ही बात
घुमड़ घुमड़ के बरस जाते हैं
मानो फिर मिलना ना हो पाये
साथ हो तनिक
पर कोई झुठ सच की बात कहां
राही ही तो है
जानने वाला तो नहीं
अपनी राह जब हो चले वो
तो एक आह!
अच्छा भला था
राहगीर......
0 Comments
Do not post spam links